Wednesday, 5 May 2010

क्या भारत की इस दसा से आप संतुष्ट है!

सुगन्ध अथवा दुर्गन्ध का यदि इतनी जल्दी प्रभाव पड़ने लगे तो हमारा देश न जाने कितनी उचाॅंइयों को छू ले परन्तु हमारा दुर्भाग्य कि हमारी गन्ध शक्ति क्षीण हो गयी है और हम बस गन्ध रहित जीवन यापन कर रहे है शायद उसी का प्रभाव है कि हमें अच्छे और बंुरे का आभास नहीं रहा यदि ऐसा होता तो अपने ही देश में हमारी यह दुर्गति नहीं होती जो हम भोग रहे है ज्यादा अच्छा यह होगा कि हम अपनी गन्ध शक्ति का आत्म परीक्षण कर इस व्यथा से मुक्त होने का प्रयास करे,हमारी शक्ति क्षीण होने का यह प्रभाव ही है कि पास में बैठा व्यक्ति यदि कश पर कश छोड़े जा रहा है तो हममे इतनी भी आत्म शक्ति नहीं होती कि उसको यह आभास कराये कि इसका प्रयोग सार्वजनिक स्थान पर पर न करे यह दूसरी बात है कि आम जन की तो गन्ध शक्ति ही क्षीण हुई है कुछ लोग तो आॅंख होते हुए भी अन्धे बने हुये है यदि ऐसा न होता तो शायद इन नशीली वस्तुओ का सेवन कदापि न करते परन्तु क्या करे हम हर विषय पर अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी मारने के आदी हो चुके है हम शायद डंडे की ही भाषा समझते है अन्य भाषायें हमारी समझ से परे हो चुकी है पुनःइन भाषाओ के ज्ञान के लियें अपनी संस्कृति का जीर्णोदार करना होगा तब कही जाकर डंडे की भाषा विलुप्त हो पायेगी यदि आप मेरी लेखनी की भाषा समझ रहे है तो मैं भी आपसे यह अपेक्षा करुॅूगा कि चन्द शब्द आप भी इस विषय पर व्यक्त करे क्योकि विचारो से ही हम आप प्रेरित होते है और विचारो के अनुसार ही हममें शक्ति का संचार होता है न मालूम आपके विचार एक नई क्रान्ति लाने के लिये लालयित हो और आपको यह आभास न हो। जिस दिन आपको यह आभास हो जायेगा कि सारी शक्तियां आपमें और हममे समायी हुई है परन्तु हम लोग उन शक्तियो को धारदार पैना नहीं करते जो लोग उन शक्तियों की भाषा समझतें है वह लोग सारी परेशानियो का भी सामना करते हुए अपने मुकाम तक पहुॅंचते है इस बात की पुष्टि ऐसे भी की जा सकती है कि यदि हम निरन्तर कोई भी अभ्यास करे तो एक दिन उस अभ्यास में हम परिपक्व हो जायेगे और परिपक्व होते हुए भी हम अभ्यास करना ही छोड़ दे तो निश्चित ही हम अपने ध्येय से ही विचलित हो जायेगे,अब यह बात मै आपके भरोसे छोड़ता हूॅ कि आप आप क्या चाहते हैं।

1 comment:

  1. इस दशा से संतुष्ट ?...अजी खीज होती है ..... पढ़कर कुछ सीखने को मिला

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